अधूरी बातों का सिलसिला

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तेरी ख़ामोशियों में लौटने की आहट रहती थी,
तू जहाँ ठहरी हुई थी, वो ठिकाना कम था।
 
मैंने देखा था तेरी आँख में लौटती हुई ऋतु,
मेरे मौसम में तेरा ठहर जाना कम था।
 
एक दरिया थी तू, रुककर मुझे नमी दी,
पर तेरे भीतर कहीं और का सावन था।
 
कुछ अधूरी-सी बातें थीं, कुछ ख़ामोशियाँ थीं,
हमारे बीच यही सबसे बड़ा सिलसिला था।
 
मैं शिकायत की ज़मीनों पर कभी उतरा ही नहीं,
तेरा जाना भी तेरी राह का सम्मान था।
 
अब जो यादों की धूप उतरती है शामों में,
लगता है साथ हमारा किसी वृक्ष का छाया-क्षण था।
 
और मैं आज भी उस मोड़ पे ठहरा हूँ मगर,
दर्द से ज़्यादा तेरी राहों पर यक़ीन था।
 
तू जहाँ पहुँची है, शायद वहीं तेरा घर होगा,
मैं तो बस एक सड़क था, जो तेरे संग कुछ दूर तक था।
 
– Bhaavin Desai (c)
 
Caption:
 
There is a quiet kind of love that asks for nothing, keeps nothing, and still remains grateful for every step shared.
 

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