कुछ शामें लौटकर आती हैं
बिना दस्तक, बिना आवाज़
खिड़की पर बैठी धूप की तरह
जो चुपचाप दिल में उतर जाती है
आसमान ने रंग बदले ऐसे
जैसे कोई ख़त पुराना खोला हो
बादलों की तहों में छिपा हुआ
किसी का नाम फिर से बोला हो
ये ढलती हुई शामें
दिल को कहीं ले जाती हैं
जहाँ कोई नहीं होता
फिर भी कमी रह जाती है
दूर कहीं मंदिर की घंटी में
एक मीठी सी थकान थी
घर लौटते परिंदों में जैसे
अपनों की पहचान थी
सड़क किनारे पीली रौशनी
धीरे-धीरे जलने लगी
और दिल में छिपी ख़ामोशी
अपनी कहानी कहने लगी
ना कोई शिकवा बाकी था
ना कोई सवाल बचा था
बस एक एहसास था हल्का सा
जो जाने कब से रुका था
ये ढलती हुई शामें
दिल को कहीं ले जाती हैं
जहाँ हम खुद से मिलते हैं
और आँखें भर जाती हैं
अगर इस पल को छू पाता
तो शायद उम्र ठहर जाती
इन फीकी पड़ती रौशनियों में
एक नई सुबह नज़र आती
रात जब अपने आँचल में
सारे रंग छुपा लेती है
तब भी ये शाम कहीं अंदर
धीरे-धीरे जला करती है
और हम मुसाफ़िर बनकर
यादों की राहों में चलते हैं
कुछ लोग छोड़ भी जाएँ तो
दिल में हमेशा रहते हैं।
– Bhavin Desai ©
Caption:
There are moments that pass,
and there are moments that become part of you.
This was never just an evening.
It was a place where memories sat beside me
and silence spoke louder than words.
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